हाँ ग़ज़ल इक हसीन ख़्वाब भी है, आप के प्रश्न का जवाब भी है । कविता या ग़ज़ल अब केवल साक़ी, शराब, साग़र, सुराही, पैमाना और मयख़ाना तक ही महदूद नहीं है । ज़िन्दगी के हर पहलू से ग़ज़ल वाक़िफ़ है । ग़ज़ल सवाल जवाब भी है, एक नारा भी है । यहाँ कुछ कवियो/ शायरों के शेर / मुक्तक प्रस्तुत हैं जो एक दूसरे की काट भी हैं ।
१. जब परछाईं अपने क़द से लम्बी हो जाये, तब समझो उस देश का सुरज ढलने वाला है ।
१. बीती निशा विहान हो रहा ये विश्वास करो, मैं कहता हूँ सूरज नया निकलने वाला है
जिसको अपने आदि अन्त का कोई पता नहीं, वो कहता है देश का सूरज ढलने वाला है ॥
२. देश की आन बान रहने दो, साथ गीता कुरान रहने दो, आरती मंदिरों में हो प्यारे मस्ज़िदों में अजान रहने दो ।
२. देश की आन बान कैसे रहे, शायरी बेज़ुबान कैसे रहे, वो ख़ुदायार और वो क़ाफ़िर साथ गीता कुरान कैसे रहे ॥
३. हूँ मुसलमाँ न इस पर सितम कीजिए, धर्म या जाति पर मत वहम कीजिए
जब ज़रूरत पडे देश को ख़ूँन की, सबसे पहले मेरा सर क़लम कीजिए ।
३. धर्म या जाति का मत भरम कीजिए, देश के हाल पे कुछ शरम कीजिए
ख़ूँ नहीं चाहिए माँ का वन्दन करो, देश पे सिर्फ़ इतना क़रम कीजिए ॥
४. दुश्मनी लाख हो पर तोडिए नहीं रिश्ता, दिल मिले या न मिले हाथ मिलाते रहिये ।
४. दिल मिला सकते नहीं तो फिर तक़ल्लुफ छोडिए, क्या ज़रूरी है मिलाएं हाथ हम सत्कार में ॥
५.उसके खारेपन में भी कोई कशिश होगी ज़रूर, वरना क्यूँ सागर में यूँ जा जा के गंगाजल मिले ।
५. शायर एक कुशल शिल्पी है ज़ख्मेदिल सिलता है, जिसके शब्दों के निनाद से इन्द्रासन हिलता है
इस जग को पावन करने सुरसरि धरती पर आई, इसीलिए खारे सागर में गंगाजल मिलता है ॥
६.राजनीति को धर्मध्वजा से जोडा जाना चाहिए, द्वार द्वार पर अश्वमेध का घोडा जाना चहिए ॥
६. राजनीति को धर्म से जब जब जोडा जायेगा, बस्ती बस्ती अश्वमेध का घोडा जायेगा
रामराज्य लानेवाले लोगो कुछ तो सोचो, सीता को फिर से जंगल में छोडा जायेगा ॥
७. जिस स्थल पर जिसकी श्रद्धा उसे वहीं पर जाना होगा, घर परिवार कुटुम्ब कबीला सब कुछ वहीं बसाना होगा
वंदे मातरम गाना होगा या इस घर से जाना होगा ।
७. जब चमन को लहू की ज़रूरत पडी सबसे पहले हमारी ही गर्दन कटी
अब तो कहते हैं हमसे ये अहले चमन ये हमारा चमन है तुम्हरा नहीं ॥
१. जब परछाईं अपने क़द से लम्बी हो जाये, तब समझो उस देश का सुरज ढलने वाला है ।
१. बीती निशा विहान हो रहा ये विश्वास करो, मैं कहता हूँ सूरज नया निकलने वाला है
जिसको अपने आदि अन्त का कोई पता नहीं, वो कहता है देश का सूरज ढलने वाला है ॥
२. देश की आन बान रहने दो, साथ गीता कुरान रहने दो, आरती मंदिरों में हो प्यारे मस्ज़िदों में अजान रहने दो ।
२. देश की आन बान कैसे रहे, शायरी बेज़ुबान कैसे रहे, वो ख़ुदायार और वो क़ाफ़िर साथ गीता कुरान कैसे रहे ॥
३. हूँ मुसलमाँ न इस पर सितम कीजिए, धर्म या जाति पर मत वहम कीजिए
जब ज़रूरत पडे देश को ख़ूँन की, सबसे पहले मेरा सर क़लम कीजिए ।
३. धर्म या जाति का मत भरम कीजिए, देश के हाल पे कुछ शरम कीजिए
ख़ूँ नहीं चाहिए माँ का वन्दन करो, देश पे सिर्फ़ इतना क़रम कीजिए ॥
४. दुश्मनी लाख हो पर तोडिए नहीं रिश्ता, दिल मिले या न मिले हाथ मिलाते रहिये ।
४. दिल मिला सकते नहीं तो फिर तक़ल्लुफ छोडिए, क्या ज़रूरी है मिलाएं हाथ हम सत्कार में ॥
५.उसके खारेपन में भी कोई कशिश होगी ज़रूर, वरना क्यूँ सागर में यूँ जा जा के गंगाजल मिले ।
५. शायर एक कुशल शिल्पी है ज़ख्मेदिल सिलता है, जिसके शब्दों के निनाद से इन्द्रासन हिलता है
इस जग को पावन करने सुरसरि धरती पर आई, इसीलिए खारे सागर में गंगाजल मिलता है ॥
६.राजनीति को धर्मध्वजा से जोडा जाना चाहिए, द्वार द्वार पर अश्वमेध का घोडा जाना चहिए ॥
६. राजनीति को धर्म से जब जब जोडा जायेगा, बस्ती बस्ती अश्वमेध का घोडा जायेगा
रामराज्य लानेवाले लोगो कुछ तो सोचो, सीता को फिर से जंगल में छोडा जायेगा ॥
७. जिस स्थल पर जिसकी श्रद्धा उसे वहीं पर जाना होगा, घर परिवार कुटुम्ब कबीला सब कुछ वहीं बसाना होगा
वंदे मातरम गाना होगा या इस घर से जाना होगा ।
७. जब चमन को लहू की ज़रूरत पडी सबसे पहले हमारी ही गर्दन कटी
अब तो कहते हैं हमसे ये अहले चमन ये हमारा चमन है तुम्हरा नहीं ॥
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